बुधवार, 13 मई 2015

तोते की फड़फडाहट

SBBJ बैंक में आज काफी भीड थी। मैं भी डायरी में एंट्री करवाने कतार में खडा था, जब मेरा नम्बर आया तो मैनें क्लर्क के सामने डायरी फैला दी। बुढ्ढा-सा दिखने वाला क्लर्क काम के बोझ से काफी परेशान लग रहा था। सिर के हिस्से के सारे बाल गायब थे और उसकी टाट पर लगे तेल से उसकी टाट हजार वॉल्ट के लट्टू की भांति चमक रही थी। ठीक उसके ऊपर बाबा आदम के जमाने का बडा पंखा मन्द गति से घर्र-घर्र कर रहा था, उससे मिलने वाली हवा से क्लर्क के माथे पर बची खरपतवार के रोयें हल्के हल्के उड रहे थे, जैसे बाल फुदक-फुदक कर कहना चाह रहे थे कि हम भी उडेंगे, हम भी जायेंगे। लेकिन बेचारों का दुर्भाग्य कि अभी भी उस बंजर माथे पर तड्प रहे थे। उनके सारे साथी काल-कवलित हुए अरसा बीत गया। उसने मेरी ओर अपने मोटी डंडी वाले चश्में के ऊपर से तिरछी नजरों से देखा और कुछ सोचकर कहा कुछ देर रुकना पडेगा, टाईम लगेगा। मैं फिर अपनी टट्टू किस्मत को कोसने लगा। ये मेरा ही काम क्यों अटक जाता है? तभी एक लम्बे कद की लड्की लम्बाई करीब पौने छ; फीट, छरहरा बदन, चूडीदार सलवार, झल्लरीवाला दुपट्टा कन्धों पर, आँखों पर जापानी पतली मोटाई वाली लाल पट्टी की चश्मा लगाए बिल्कुल मेरे बगल में आकर खडी हुई, मैनें एक नजर उसको माथे से लेकर एडी तक निहारा और बिल्कुल ऐसे निहारा कि जैसे मेरी आँखों मे एट पिक्चल कैमरा लगा हो और उसकी तस्वीर मेरे कैमरे में कैद हो गई हो। मैं अक्सर हर आदमी में अपनी कहानी का किरदार ढूँढ रहा था, आज मैं अपनी कहानी के किरदार के काफी करीब था, ऐसा मेरे अंतर्मन में अहसास अवश्य हुआ लेकिन विश्वास नहीं क्योंकि बैंक में मिलने वाले ग्राहक मुझे फिर कहीं नहीं मिलने वाले। तभी तिरछी नजर से उस लडकी ने एक पल के लिये मेरी ओर देखा और बेकार की चीज समझ कर शायद ! उसने नजरें फेर बाबूजी पर जमा ली और बोली बाबूजी एंट्री करना प्लीज। अब मेरे लिये स्थिति देखने लायक थी, मैं आज बाबूजी के अन्दर के बाबू को पहचानने का इंतजार कर रहा था। मेरे मन में कहीं न कहीं यह बात अवश्य थी कि पुरुष लोग महिलाओं को काफी तवज्जो देते है, लेकिन यह बुढ्ढा ऐसा करता है या नहीं? लेकिन कहते है न कि शेर कभी बुढ्ढा नहीं होता। बाबूजी ऐसा मौका गँवाना नहीं चाहते थे। बाबूजी ने सुरीली आवाज सुनते ही अपने झुर्रीदार गालों को फुलाकर हल्की सी मुस्कान बिखेरी और मेरी ओर तिरछी नजरों से देखकर तपाक से लडकी से डायरी ली और प्रिंटर में डाल दी। अब बाबूजी के अंतर्मन में द्वन्द्व छिड गया था और अपने उड रहे तोते के फड्फडाहने की आवाज को मुझ तक पँहुचने से रोकने के लिये मेरी ओर हल्की-सी जबरदस्ती गालों को धकेल कर एक मुस्कान फैलाई और मेरी डायरी माँगी व धीरे से बुदबुदाया वो क्या थोडा-सा काम अधिक था देरी हो गई। लेकिन मैं बाबू के अन्दर उडने वाले तोते की फड्फडाहट सुन चुका था। क्लर्क ने लड्की की डायरी वापस थमा दी और लड्की के चेहरे के भाव पढने की कोशिश में अपनी मुँडी लड्की की तरफ तान अपनी नजरें उस लडकी की नजरों में डाल दी। लडकी ने तुरंत हल्की-सी मुस्कान से बडी ही मधुर आवाज में कहा थैंक्यु.......। बाबूजी जाने कहाँ खो गये? मैनें उनकी झप्पी तोडते हुए कहा बाबूजी मेरी डायरी... ? बाबूजी जैसे सिहर उठे, कंप-कंपा कर कहा हं...हाँ ओ आपकी डायरी? ये लीजिये। मै भी हल्की-सी मुस्कान से अहसास दिलाना चाहता था कि आपके अन्दर उड्ने वाले तोते की फड्फडाहट मैं पहचान चुका हूँ।
साभार: मन के मोती (गोविन्द सारण) @ कॉपीराईट अधिकार सुरक्षित

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